साधना
बाबा का जीवन बताता है कि साधना निरंतरता, धैर्य और पूर्ण विश्वास से फलित होती है। वे गुफा-निवास, जप, योग और उपासना में लीन रहते थे।
Pawhari Baba Ashram
Kurtha, Ghazipur, Uttar Pradesh
जीवन, साधना और सेवा की पावन कथा
पवहारी बाबा का जन्म सन् 1840 ई. में जौनपुर जनपद के प्रेमापुर गांव में वेदज्ञ तपोनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ। बाल्यावस्था में उनका नाम हरिभजन दास था। छोटे पिताजी संत लक्ष्मीनारायण जी के सान्निध्य में उन्होंने धार्मिक और नैतिक शिक्षा प्राप्त की।
कुर्था की सिद्ध भूमि पर उन्होंने योग, तपस्या, ईश्वर-पूजा, अतिथि-सेवा और भक्ति को जीवन का केंद्र बनाया। वे स्वयं को दास कहते और सभी प्राणियों में नारायण का दर्शन करते थे। कठिन साधना, गुफा-निवास, उपासना और सेवा से उनका जीवन लोक के लिए प्रेरणा बना।
बाबा के जीवन से सेवा, सात्विकता, गुरु-भक्ति और अतिथि-सत्कार की जो परंपरा मिली, वही आज भी आश्रम की आत्मा है।
बाबा का जीवन बताता है कि साधना निरंतरता, धैर्य और पूर्ण विश्वास से फलित होती है। वे गुफा-निवास, जप, योग और उपासना में लीन रहते थे।
अतिथि-सत्कार, भंडारा, सात्विक भोग और श्रद्धालुओं की सेवा आश्रम की जीवंत परंपरा है। यही मंदिर की daily व्यवस्था का आधार है।
वे स्वयं को “दास” कहते थे। यह भाव हमें अहंकार से दूर रहकर हर प्राणी में ईश्वर का दर्शन करने की प्रेरणा देता है।
पावन स्थलों और दिव्य स्मृतियों के पल